📜 परिचय
🏹 उत्पत्ति
• अबुल फ़ज़ल – ईरान के शासक नौशेर खाँ आदिल की संतान
• डी.आर. भंडारकर, गोपीनाथ शर्मा, दशरथ शर्मा, जे.एन. आसोपा, मुहणोत नैणसी – ब्राह्मण वंश से
• मेवाड़ शासक स्वयं को भगवान राम का वंशज मानते हैं
• पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा – सूर्यवंशी
• कर्नल जेम्स टॉड व मुहणोत नैणसी – 24 शाखाएँ
• कवि श्यामलदास – 36 शाखाएँ
👑 गुहिल / गुहिलादित्य
गुहिल वंश का संस्थापक / आदिपुरुष – 566 ई. लालन-पालन गुणफा में कमलावती ब्राह्मणी ने किया।
👑 बप्पा रावल (734–753 ई.)
• हारित ऋषि की गायें चराता था, हारित ऋषि के आशीर्वाद से मेवाड़ राज्य प्राप्त किया।
• 734 ई. – चित्तौड़गढ़ शासक मानमोरी को पराजित कर चित्तौड़गढ़ पर अधिकार, नागदा को राजधानी बनाया।
• गुहिल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक।
• कैलाशपुरी गाँव में एकलिंगनाथ जी का मंदिर बनवाया।
• सी.वी. वैद्य – तुलना चार्ल्स मार्टेल से।
• मेवाड़ महाराणा स्वयं को एकलिंग जी का दीवान कहते हैं।
• मेवाड़ में सोने के सिक्के चलवाए।
• उपाधि: चक्रवर्ती, हिन्दुआ सूरज (गुहिल वंश के सभी शासक स्वयं को हिन्दुआ सूरज कहते थे।)
👑 अल्लट
- उपाधि – आलू रावल (ख्यात साहित्य में)
- हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह।
- आहड़ को दूसरी राजधानी बनाया, आहड़ में वराह मंदिर का निर्माण।
- सर्वप्रथम मेवाड़ में नौकरशाही की शुरुआत।
👑 रणसिंह / कर्णसिंह
दो पुत्र – क्षेमसिंह (रावल शाखा) व राहप (सिसोदा गाँव – सिसोदिया वंश की नींव)।
👑 रावल सामन्त सिंह
कीर्तिचौहान ने मेवाड़ पर अधिकार कर लिया, तब इन्होंने वागड़ राज्य की स्थापना की।
👑 रावल जैत्रसिंह (1213–1253 ई.)
• जैत्रसिंह ने चित्तौड़गढ़ को राजधानी बनाया।
• डॉ. दशरथ शर्मा – मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल।
• डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा – “दिल्ली के गुलाम वंश के सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रभावी और बलवान राजा।”
👑 रावल तेजसिंह
- कमलचंद्र द्वारा ताड़पत्र पर चित्रित प्रथम ग्रंथ – ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी’।
- परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर उपाधि धारण की।
- पत्नी जेतलदेवी – चित्तौड़गढ़ में श्याम पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण।
👑 समरसिंह
प्रमुख शिल्पी – पद्मसिंह, केलसिंह, केल्हण तथा कर्मसिंह।
👑 रावल रतनसिंह (1302–1303 ई.)
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण: चित्तौड़ का व्यापारिक व सामरिक महत्व, साम्राज्यवादी होना, रानी पद्मिनी को प्राप्त करना (डॉ. दशरथ शर्मा)।
रानी पद्मिनी: सिंहलद्वीप (श्रीलंका) की राजकुमारी, पिता – गंधर्वसेन, माता – चंपावती।
हीरामन तोते ने पद्मिनी की सुंदरता का वर्णन किया।
राघव चेतन – पद्मिनी पर बुरी नजर, रतनसिंह ने निकाल दिया → अलाउद्दीन के पास गया।
गोरा–बादल – रतनसिंह के सैनिक, क्रमशः पद्मिनी के चाचा–भाई।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग का प्रथम साका – 26 अगस्त 1303 – जौहर (पद्मिनी), केसरिया (रावल रतनसिंह)।
• मेवाड़ का प्रथम साका।
• वर्णन – अमीर खुसरो (खजाइन-उल-फुतूह / तारीख-ए-अलाई)।
• अलाउद्दीन ने दुर्ग पुत्र खिज्र खाँ को सौंपा, नाम खिज्राबाद रखा। बाद में मालदेव सोनगरा को सौंप दिया।
👑 राणा हम्मीर (1326–1364 ई.)
• उपाधि राणा / महाराणा थी।
• सिसोदा ठिकाने के जागीरदार हम्मीर ने 1326 में चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार किया।
• उपनाम – मेवाड़ का उद्धारक (मुक्तिदाता)।
• कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में विषम घाटी पंचानन, रसिक प्रिय टीका में वीर राजा।
• चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता का मंदिर बनवाया।
सिंगोली (बाँसवाड़ा) का युद्ध – 1336 ई. – राणा हम्मीर V/S मुहम्मद बिन तुगलक – हम्मीर विजयी।
👑 राणा क्षेत्रसिंह (1364–1382 ई.)
मालवा के दिलावर खाँ गौरी को परास्त कर मालवा–मेवाड़ संघर्ष को आरम्भ किया।
👑 राणा लक्षसिंह / लाखा (1382–1421 ई.)
- जावर से चाँदी की खान निकली – आर्थिक विकास।
- छीतर बंजारे द्वारा पिछोला झील बनवाई गई (नटनी का चबूतरा)।
- दरबारी विद्वान – धनेश्वर भट्ट, झोटिंग भट्ट।
- कुम्भा हाड़ा – बूंदी के नकली दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति।
👑 राणा चूंडा
मेवाड़ का भीष्म पितामह कहते हैं। हंसाबाई की शादी राणा लाखा के साथ इस शर्त पर – इनसे पुत्र ही मेवाड़ का शासक बनेगा। राणा चूंडा ने प्रतिज्ञा ली – मेवाड़ की गद्दी पर उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं बैठेगा।
👑 महाराणा मोकल (1421–1433 ई.)
- राणा लाखा व हंसाबाई का पुत्र।
- त्रिभुवन नारायण मंदिर का जीर्णोद्धार – मोकल का मंदिर / समिद्धेश्वर मंदिर।
- शिल्पी – मना, फना, विसल; विद्वान – योगेश्वर, भट्ट विष्णु।
- जीलवाड़ा अभियान – 1433 ई. – महपा पंवार के कहने पर चाचा–मेरा ने मोकल की हत्या कर दी।
👑 महाराणा कुम्भा (1433–1468 ई.)
सारंगपुर (मध्यप्रदेश) का युद्ध – 1437 ई. – मालवा के महमूद खिलजी प्रथम को 6 माह कैद रखा, फिर छोड़ा।
विजय स्तम्भ – चित्तौड़गढ़ दुर्ग में (1440–1448 ई.) भगवान विष्णु को समर्पित।
नागौर विजय – शम्स खाँ व मुजाहिद खाँ के संघर्ष में कुम्भा ने नागौर पर अधिकार कर लिया।
चम्पानेर (गुजरात) की संधि – 1456 ई. – कुतुबुद्दीन शाह व महमूद खिलजी प्रथम के मध्य मेवाड़ को बाँटने की शर्त।
बदनोर (ब्यावर) का युद्ध – 1457 ई. – कुम्भा विजयी, कुशालमाता मंदिर का निर्माण।
🏛️ स्थापत्य कला
- श्यामलदास (वीर विनोद) – 84 में से 32 दुर्गों का निर्माण।
- कुम्भलगढ़ दुर्ग, बसन्ती दुर्ग (सिरोही), अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही), देवर दुर्ग, भोमट दुर्ग, मचान दुर्ग (सिरोही) का निर्माण।
- राजस्थानी वास्तुकला (स्थापत्य कला) का जनक कहते हैं।
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुम्भश्याम मंदिर (1448), श्रृंगार चँवरी मंदिर।
📚 साहित्य
- संगीत गुरु – सारंग व्यास
- काव्य गुरु – कान्ह व्यास
- चित्रकला गुरु – जैनाचार्य हीरानंद मुनि (उपाधि – कविचक्र)
🎵 संगीत पर ग्रंथ
- संगीत राज (सर्वश्रेष्ठ) – पाँच भाग – पाठ रत्न कोष, गीत रत्न कोष, वाद्य रत्न कोष, नृत्य रत्न कोष, रस रत्न कोष
- संगीत मीमांसा, सूद प्रबन्ध / सुधा प्रबन्ध, चण्डीशतक, कामराज रतिसार
- रसिक प्रिया टीका – जयदेव के गीत गोविन्द पर
- एकलिंग महात्म्य – कान्ह व्यास (प्रथम भाग राजवर्णन – कुम्भा ने लिखा)
- शिल्पी मंडन (भाई नाथा, पुत्र गोविन्द)
शिल्पी मंडन की पुस्तकें
| पुस्तक | विषय |
|---|---|
| प्रसाद मंडन | महलों के बारे में |
| रूप मंडन | मूर्तियों के बारे में |
| राजवल्लभम् | सामान्य आवास, गृह का वर्णन |
| कोदण्ड मंडन | धनुर्विद्या के बारे में |
| देवमूर्ति प्रकरण | मूर्ति स्थापना |
| शकुन मंडन | शुभ-अशुभ का वर्णन |
| वैद्य मंडन | व्याधियों व निदान से संबंधित |
- वास्तु मंडन, वास्तु सार, वास्तु शास्त्र भी मंडन की पुस्तकें हैं।
- महाराणा कुम्भा वीणा बजाने में रुचि रखते थे।
- पुत्री रमाबाई – वागीश्वरी देवी की उपाधि।
- अंतिम समय – उन्माद रोग, उदा ने मामादेव कुण्ड (कुम्भलगढ़) में हत्या कर दी।
📌 कुम्भा की उपाधियाँ
- अभिनव भरताचार्य – संगीत का ज्ञान
- हाल गुरु – गिरी दुर्गों के स्वामी
- शैल गुरु – युद्ध में निपुण
- छाप गुरु – छापामार युद्ध
- हिंदू सुल्तान – मुस्लिम शासकों से रक्षा
- राय रासो / रणो रासो – विद्वानों का आश्रयदाता
- राजगुरु – राजनीति में दक्ष
- अश्वपति – कुशल घुड़सवार
- नरपति – मानव में श्रेष्ठ
- परम गुरु
- दानगुरु
- चाप गुरु – धनुष अच्छा चलाने के कारण
📚 दरबारी विद्वान
- सोम सुन्दर, मुनिसुंदर, जयचंद सूरी, मुनि जिनसेन सूरी, सोमदेव, धनचंद सूरी, सुन्दरसूरी, सुन्दरसुरीणि, टिल्ला भट्ट, नाथा, अत्रि, महेश
👑 उदा सिसोदिया (1468–1473 ई.)
मेवाड़ का पितृहन्ता। भाई रायमल ने दातीपुर के युद्ध में परास्त किया, उदा मालवा भागा, बिजली गिरने से मृत्यु।
👑 महाराणा रायमल (1473–1509 ई.)
- एकलिंग जी के मंदिर का पुनर्निर्माण।
- पत्नी श्रृंगार देवी – घोसुण्डी की बावड़ी (चित्तौड़)।
- शिल्पी – अर्जुन; विद्वान – गोपाल भट्ट, महेश।
👑 पृथ्वीराज सिसोदिया / उडणा राजकुमार
- अजमेर दुर्ग के चारों ओर परकोटा → तारागढ़ (रानी ताराबाई के नाम पर)।
- 12 खंभों की छतरी – कुम्भलगढ़ दुर्ग।
- राणा सांगा की आँख फोड़ दी। सांगा सेवंत्री गाँव → राठौड़ बीदा → अजमेर (रावत कर्मचंद)।
👑 महाराणा संग्रामसिंह / राणा सांगा (1509–1528 ई.)
• कर्नल जेम्स टॉड – सैनिक का भग्नावशेष
• हिंदूपत कहा जाता है।
• अंतिम भारतीय हिंदू राजा जिसके नीचे सभी राजपूत जातियाँ विदेशियों के भगाने के लिए एक हुई।
खतोली (पीपल्दा–कोटा) का युद्ध – 1517 ई. – इब्राहिम लोदी को हराया, सांगा लंगड़ा हो गया।
बाड़ी (धौलपुर) का युद्ध – 1518 ई. – इब्राहिम लोदी के सेनापति मियाँ माखन व मियाँ हुसैन को हराया।
गागरोन का युद्ध – 1519 ई. – मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय को 6 माह कैद रखा, फिर छोड़ा।
गुजरात विजय – 1520 ई. – रायमल का साथ देकर ईडर (गुजरात) का शासक रायमल को बनाया।
बयाना (भरतपुर) का युद्ध – 16 फरवरी 1527 – राणा सांगा विजयी, अरबी ताशा मेवाड़ के सैनिक यंत्रों में शामिल।
⚔️ खानवा का युद्ध – 17 मार्च 1527 ई.
• बाबर ने जिहाद घोषित किया।
• बाबर ने शराब नहीं पीने तथा तमगा कर हटाने के लिए कहा।
• राजस्थान के 7 राजा, 9 राव, 104 सरदार सांगा की सहायता के लिए आए।
• खानवा विजय के बाद बाबर ने गाजी उपाधि धारण की।
• बाबरनामा में खानवा युद्ध को अपने जीवन का काला दाग कहा।
• रायसीन के सलहदी तंवर व नागौर के खानजादा युद्ध से पहले बाबर से मिल गए।
• युद्ध में राणा सांगा बेहोश → बसवा (दौसा) में इलाज (सांगा का चबूतरा)।
• मेवाड़ी सरदारों ने राणा सांगा को जहर दे दिया।
• 30 जनवरी 1528 – कालपी (उत्तरप्रदेश) में मृत्यु।
• अंतिम संस्कार – मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) – 8 खंभों की छतरी।
• राणा सांगा की एक आँख, एक हाथ, एक पैर नहीं था।
📌 राणा सांगा की सहायता करने वाले शासक
- अफगान सुल्तान – महमूद लोदी
- मेवाड़ शासक – हसन खाँ मेवाती (सांगा का सेनापति)
- मारवाड़ – राव मालदेव (राव गांगा का पुत्र)
- बीकानेर – राव कल्याणमल (राव जैतसी का पुत्र)
- आमेर – पृथ्वीराज कच्छवाहा
- मेड़ता – रायमल राठौड़, वीरमदेव मेड़तिया
- चंदेरी – मेदिनीराय
- ईडर – भारमल
- वागड़ (डूंगरपुर) – महारावल उदयसिंह
- देवलिया (प्रतापगढ़) – रावत बाघसिंह
- अजमेर – कर्मचंद पंवार
- जजनेर – अशोक परमार
- सादड़ी – झाला अज्जा
- सालूम्बर – रतनसिंह चूंडावत
- सिरोही – अखेराज देवड़ा
- परमार वंश – गोकुलदास परमार
- नागौर – खानजादा
- रायसीन – सलहदी तंवर
सादड़ी के झाला अज्जा ने राणा सांगा के बेहोश होने पर राजचिह्न धारण किया।
⚔️ पानीपत का प्रथम युद्ध – 21 अप्रैल 1526 ई.
- बाबर V/S इब्राहिम लोदी – बाबर विजयी (तोप, बारूद का प्रयोग)।
- बाबर की पुस्तक – बाबरनामा / तुज़ुक-ए-बाबरी (तुर्की भाषा) – फारसी अनुवाद अब्दुल रहीम ने किया।
- बाबर के चार युद्ध – पानीपत, खानवा, चंदेरी (जनवरी 1528), घाघरा (1529)
👑 महाराणा रतनसिंह (1528–1531 ई.)
राणा सांगा के पुत्र भोजराज (मीराबाई का पति) का खातौली युद्ध में निधन। रतनसिंह अहेड़िया उत्सव में मारे गये।
👑 महाराणा विक्रमादित्य (1531–1536 ई.)
• 1533 – गुजरात के बहादुर शाह ने आक्रमण, कर्मवती ने रणथम्भौर दुर्ग देकर संधि की।
• 1535 – बहादुरशाह ने पुनः आक्रमण, कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजी।
चित्तौड़ का दूसरा साका – 1535 ई. – केसरिया (देवलिया के रावत बाघसिंह), जौहर (कर्मवती व विक्रमादित्य की पत्नी जवाहर बाई)।
• बनवीर (पृथ्वीराज सिसोदिया के दासी पुत्र) ने 1536 में विक्रमादित्य की हत्या कर दी।
• पन्नाधाय ने अपने बेटे चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह के प्राण बचाये।
👑 महाराणा उदयसिंह (1537–1572 ई.)
• मावली का युद्ध – 1540 ई. – मालदेव के सहयोग से बनवीर को पराजित कर चित्तौड़ पुनः प्राप्त किया।
• शेरशाह सूरी ने मेवाड़ पर आक्रमण किया – उदयसिंह ने किले की चाबियाँ भिजवा दी।
• कर्नल टॉड – “यदि राणा सांगा और प्रताप के बीच में उदयसिंह नहीं होता तो मेवाड़ का इतिहास और अधिक उज्ज्वल होता।”
• 1559 – उदयसागर झील बनाकर उदयपुर नगर बसाया, राजधानी बनाया।
अकबर का आक्रमण – 1567 ई. – राणा उदयसिंह ने दुर्ग जयमल मेड़तिया को सौंपकर गोगुंदा की पहाड़ियों में चले गये।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग का तीसरा साका – 25 फरवरी 1568 – केसरिया (जयमल मेड़तिया, फत्ता सिसोदिया), जौहर (फूलकंवर के नेतृत्व में)।
• कल्ला राठौड़ ने चाचा जयमल को कंधे पर बैठाकर युद्ध किया।
• अकबर ने 30,000 व्यक्तियों का कत्लेआम – अकबर के जीवन का अमिट कलंक।
• अकबर ने मेवाड़ में एलची सिक्के जारी करवाये।
• 28 फरवरी 1572 – गोगुंदा में मृत्यु, छतरी – गोगुंदा (उदयपुर)।
👑 महाराणा प्रताप (1572–1597 ई.)
पिता: राणा उदयसिंह, माता: जैवन्ता बाई (पाली के अखेराज सोनगरा की पुत्री)
बचपन का नाम – कीका (भीलों के बच्चे को बोलते हैं)
• राणा उदयसिंह ने जगमाल को युवराज घोषित किया।
• 28 फरवरी 1572 – गोगुंदा में सलूम्बर के कृष्णदास चूंडावत ने राणा प्रताप का राज्याभिषेक किया (विधिवत – कुम्भलगढ़ में)।
अकबर के चार शिष्ट मंडल – जलाल खाँ (सितम्बर 1572), मिर्जा राजा मानसिंह (जून 1573), भगवन्त दास कच्छवाहा (अक्टूबर 1573), टोडरमल (दिसम्बर 1573)।
⚔️ हल्दीघाटी (राजसमंद) का युद्ध – 18 जून 1576 ई.
स्थान: खमनौर (राजसमंद), बनास नदी किनारे
• अकबर की 80,000 सेना (सेनापति – मिर्जा राजा मानसिंह)
• महाराणा प्रताप की 20,000 सेना (सेनापति – हकीम खाँ सूर)
• महाराणा प्रताप के घोड़ा चेतक – टूटी टांग के साथ बलीचा के पास नाला पार करते हुए वीरगति।
• सादड़ी के झाला बीदा (झाला मन्ना / माना) ने राणा प्रताप का छत्र धारण किया और वीरगति को प्राप्त हुआ।
• युद्ध के उपनाम – गोगुंदा का युद्ध (अब्दुल कादिर बदायूँनी), खमनौर का युद्ध (अबुल फ़ज़ल), मेवाड़ की थर्मोपल्ली (कर्नल जेम्स टॉड)।
• कर्नल जेम्स टॉड ने प्रथम बार इसे हल्दीघाटी के नाम से संबोधित किया।
• हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप ने छापामार युद्ध प्रणाली का प्रयोग किया।
📌 अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ
- भामाशाह की भेंट – चूलिया गाँव में 25 लाख रुपये व 20 हजार अशर्फियाँ भेंट की। मेवाड़ का उद्धारक, दानवीर कहलाते हैं।
- अब्दुल रहीम खान-ए-खाना का आक्रमण – 1580 – अमरसिंह ने बेगमों को बंदी बनाया, प्रताप ने सम्मान के साथ वापस भेजा।
- दिवेर का युद्ध – अक्टूबर 1582 – मेवाड़ का मेराथन (कर्नल जेम्स टॉड)। अमरसिंह ने सरीफा सुल्तान खाँ को धराशायी किया।
- जगन्नाथ कच्छवाहा का आक्रमण – 1584 – राणा प्रताप के विरुद्ध अंतिम सैनिक अभियान।
- चावंड (सराड़ा – सलूम्बर) – 1585 में आपातकालीन राजधानी (1585–1615 तक)।
- दरबारी कवि चक्रपाणि मिश्र – विश्ववल्लभ, मुहूर्तमाला, व्यवहारदर्श, राज्याभिषेक पद्धति।
- 19 जनवरी 1597 – मृत्यु, 8 खंभों की छतरी – बाडोली (सलूम्बर) केजड़ बाँध पर।
- दुरसा आढ़ा – विरूद छहत्तरी, कन्हैयालाल सेठिया – पाथल (महाराणा प्रताप), पीथल (पृथ्वीराज राठौड़)
👑 महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597–1620 ई.)
शर्तें – महाराणा मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध नहीं बनाएगा, मुगल दरबार में नहीं जायेगा (युवराज जायेगा), चित्तौड़ दुर्ग वापस (मरम्मत नहीं होगी)।
• सर टामस रो – “बादशाह ने मेवाड़ के महाराणा को मनसबों से अधीन किया था, न कि बल से।”
• छतरी – आहड़ (उदयपुर)।
• दरबारी कवि जीवाधर – अमरसार ग्रंथ।
👑 महाराणा कर्णसिंह (1620–1628 ई.)
- मुगल दरबार में जाने वाला प्रथम मेवाड़ युवराज।
- जहाँगीर ने 5000 का मनसबदार बनाया।
- पिछोला झील में जगमंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया (पूरा – जगतसिंह प्रथम ने)।
- 1622 – खुर्रम (शाहजहाँ) ने विद्रोह किया, कर्णसिंह ने जगमंदिर में शरण दी।
👑 महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628–1652 ई.)
- जगदीश मंदिर / सपनों में बना मंदिर बनवाया।
- धाय नोजूबाई के लिए धाय मंदिर बनवाया।
- चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत कार्य प्रारम्भ करवाया।
👑 महाराणा राजसिंह (1652–1680 ई.)
• शाहजहाँ के पुत्रों के उत्तराधिकारी युद्ध में किसी का साथ नहीं दिया।
• औरंगजेब ने 6 हजार का मनसबदार बनाया, ग्यासपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा के परगने दिए।
• राजकुमारी चारुमति विवाह (1669) – किशनगढ़ के राजा मानसिंह की बहन चारुमति से औरंगजेब शादी करना चाहता था, लेकिन राणा राजसिंह ने शादी कर ली।
• हाड़ी रानी सहलकँवर – रतनसिंह चूंडावत की पत्नी ने शीश काटकर सेनाणी दी। (मेहराज मुकुल – “चूंडावत माँगी सेनाणी, सिर काट दे दिया क्षत्राणी”)
• औरंगजेब ने 1669 में मंदिर तोड़ो अभियान व 1679 में जजिया कर लगाया – विरोध किया।
उदयपुर का युद्ध – 1680 – औरंगजेब का आक्रमण विफल (राजसिंह + दुर्गादास राठौड़)
• टीका दौड़ – शिकार के बहाने मुगल चौकियों पर हमले।
• राजनगर (राजसमंद) बसाया।
• विजय कटकोट की उपाधि धारण की।
• श्रीनाथ जी को सिहाड़ तथा द्वारिकाधीश को कांकरोली (राजसमंद) में प्रतिष्ठित कराया।
👑 महाराणा जयसिंह (1680–1698 ई.)
- 1681 – औरंगजेब के साथ संधि – पुर, माण्डल व बदनोर जजिया कर के बदले सौंपे।
- जयसमंद झील का निर्माण करवाया।
👑 महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698–1710 ई.)
देबारी समझौते (1708) के तहत पुत्री चन्द्रकँवरी का विवाह सवाई जयसिंह के साथ किया।
👑 महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710–1734 ई.)
- सहेलियों की बाड़ी और सिसारमा में वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण।
- इनके समय मेवाड़ चित्रशैली का प्रसिद्ध चित्र “कलीला दमना” का चित्रण हुआ।
👑 महाराणा जगतसिंह द्वितीय (1734–1751 ई.)
- हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की।
- मराठों का सर्वप्रथम आक्रमण मेवाड़ पर।
- पिछोला झील में जगनिवास महल बनवाया।
- अजमेर की दरगाह के लिए 4 गाँव दान दिए।
- दरबारी कवि नेकराम – जगद्विलास ग्रंथ।
👑 महाराणा भीमसिंह (1778–1828 ई.)
- कृष्णा कुमारी विवाद (जयपुर इतिहास देखें)।
- 13 जनवरी 1818 – अंग्रेजों के साथ सहायक संधि।
👑 महाराणा सरदार सिंह (1838–1842 ई.)
भील जनजाति के उपद्रव को दबाने के लिए 1841 में मेवाड़ भील कोर (M.B.C.) का गठन।
👑 महाराणा स्वरूप सिंह (1842–1861 ई.)
- स्वरूपशाही सिक्के – एक ओर चित्रकूट उदयपुर, दूसरी ओर दोस्ती लंदन।
- 1857 की क्रांति के समय शासक।
- 1844 – कन्या वध, 1853 – डाकन प्रथा, 15 अगस्त 1861 – सती प्रथा पर रोक।
- पासवान ऐंगाबाई सती हुई – मेवाड़ महाराणाओं के साथ सती होने की अंतिम घटना।
👑 महाराणा शम्भू सिंह (1861–1874 ई.)
- 1866 – कचहरी खास, 1869 – महकमा खास (सर्वोच्च न्याय अदालत)।
- ब्रिटिश सरकार ने ग्रांड कमाण्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया की उपाधि दी (पहले मना किया, बाद में स्वीकार)।
👑 महाराणा सज्जन सिंह (1874–1884 ई.)
- 1877 – इजलास खास (15 सदस्य सभा)।
- 1880 – महेन्द्रराज सभा (17 सदस्य)।
- सज्जन यंत्रालय – उदयपुर में छापेखाना, सज्जन कीर्ति सुधाकर (मेवाड़ का प्रथम प्रशासनिक समाचार पत्र, 1879)।
- सज्जन वाणी विलास पुस्तकालय की स्थापना।
- 1881 – लॉर्ड रिपन ने ग्रांड कमाण्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया का खिताब दिया।
- स्वामी दयानंद सरस्वती जी उदयपुर आये – सत्यार्थ प्रकाश की रचना।
- श्यामलदास को कविराज की उपाधि देकर वीर विनोद ग्रंथ लिखने के लिए नियुक्त किया।
👑 महाराणा फतहसिंह (1884–1930 ई.)
ब्रिटेन के राजकुमार कॉनॉट के आगमन पर कॉनॉट बाँध की नींव रखी, बाद में फतहसागर नाम रखा।
👑 महाराणा भूपाल सिंह (1930–1955 ई.)
मेवाड़ के अंतिम महाराणा। एकीकरण के समय राज्य के महाराज प्रमुख बनाये गये।
🏰 गुहिलों की अन्य शाखाएँ
• राजधानी – वटपुरक (बजैड़ा)
• संस्थापक – सामन्त सिंह
• डूंगरसिंह (1358) – डूंगरपुर नगर बसाया, राजधानी बनाया। (नाम – भील नानी पाल / डूँगरिया भील की डाणी)
• महारावल उदयसिंह – वागड़ का बँटवारा – डूंगरपुर (पृथ्वीराज), बाँसवाड़ा (जगमाल – 1530 में बाँसवाड़ा में गुहिल वंश की नींव)।
• प्रतापगढ़ – राणा मोकल के पुत्र क्षेमसिंह से।
• शाहपुरा – 1631 में अमरसिंह प्रथम के पौत्र सुजानसिंह ने स्थापना की।
