होली में भांग का उपयोग भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। भांग एक प्रकार की खाद्य तैयारी है जो कैनबिस (गांजा) पौधे की पत्तियों से बनाई जाती है, और इसे आमतौर पर ठंडाई में मिलाकर पीया जाता है। यह होली के उत्सव का एक अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इसका इतिहास हजारों साल पुराना है। मैं आपको विस्तार से बताता हूं, जिसमें ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक पहलू शामिल हैं, साथ ही विश्वसनीय स्रोतों के साथ।
भांग का ऐतिहासिक उद्गम
भांग का उपयोग भारत में कम से कम 1000 ईसा पूर्व से हो रहा है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद, जो हिंदू धर्म के चार पवित्र ग्रंथों में से एक है और लगभग 2000-1400 ईसा पूर्व लिखा गया माना जाता है, भांग को पृथ्वी पर पांच सबसे पवित्र पौधों में से एक बताता है। इसे “खुशी का स्रोत” और “मुक्तिदाता” कहा गया है। यह पौधा आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी इस्तेमाल होता था, जहां इसे चिंता दूर करने वाली जड़ी-बूटी के रूप में वर्णित किया गया है।
भारत में कैनबिस की खेती और उपयोग कम से कम 2000 साल पुराना है, और यह वैदिक काल से ही भोजन और पेय में शामिल रहा है। 1894 में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित भारतीय गांजा आयोग की रिपोर्ट में भी भांग के होली में व्यापक उपयोग का उल्लेख है, जहां कहा गया है कि होली पर भांग का सेवन लगभग सार्वजनिक था। आज भी उत्तर भारत में होली पर भांग की परंपरा सबसे मजबूत है, जहां इसे ठंडाई, पकौड़ों या अन्य व्यंजनों में मिलाया जाता है।
पौराणिक संबंध: भांग और भगवान शिव
होली में भांग का आगमन मुख्य रूप से भगवान शिव से जुड़ा है, जिन्हें “भांग के स्वामी” कहा जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन (दूध के सागर का मंथन) के दौरान देवताओं और असुरों ने अमृत (अमरता का अमृत) प्राप्त करने के लिए सागर को मथा। इस प्रक्रिया में अमृत के अलावा एक घातक जहर (हलाहल) भी निकला। भगवान शिव ने दुनिया की रक्षा के लिए इस जहर को पी लिया, जिससे उनके गले में दर्द हुआ। दर्द को शांत करने के लिए उनकी पत्नी पार्वती ने उन्हें दूध-आधारित पेय (जिसमें भांग मिली थी) पिलाया। एक अन्य कथा के अनुसार, जहां अमृत की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, वहां कैनबिस उगा।
एक और कथा में कहा जाता है कि भांग होली पर इसलिए पी जाती है क्योंकि यह शिव के वैराग्य (सन्यासी जीवन) से गृहस्थ जीवन (पारिवारिक जीवन) में लौटने का जश्न मनाती है। शिव भक्त, जैसे साधु और सूफी, ध्यान और आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त करने के लिए भांग का उपयोग करते थे। होली के अलावा, महाशिवरात्रि पर भी भांग का वितरण पारंपरिक है।
सांस्कृतिक महत्व और आधुनिक संदर्भ
भांग को होली में शामिल करने का कारण उत्सव की खुशी, रंगों और सामाजिक एकता को बढ़ाना है। यह एक प्रकार का हल्का नशा प्रदान करता है जो लोगों को चिंताओं से मुक्त करता है, जैसा कि वेदों में वर्णित है। हालांकि, आधुनिक समय में भांग का सेवन कानूनी रूप से नियंत्रित है—भारत में कैनबिस के पत्तों और बीजों का उपयोग वैध है, लेकिन फूल और राल (चरस) प्रतिबंधित हैं। फिर भी, होली पर यह सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य है और कई जगहों पर सरकारी दुकानों से उपलब्ध होती है।
यह परंपरा उत्तर भारत में सबसे प्रचलित है, जहां होली को “भांग की होली” के रूप में जाना जाता है। बॉलीवुड गानों में भी इसका जिक्र मिलता है, जैसे “भांग का रंग जमा हो चकाचक”। हालांकि, पश्चिमी प्रभाव से शराब और तंबाकू जैसे अन्य नशे बढ़े हैं, लेकिन होली पर भांग की परंपरा बरकरार है।
