Article 370 History Hindi: 1947 विलय से 2019 निरस्तीकरण, सुप्रीम कोर्ट 2023 फैसला । जम्मू कश्मीर विशेष दर्जा का अंत | धारा 370 पूरी जानकारी

धारा 370 पूरी जानकारी

Article 370 History Hindi: 1947 विलय से 2019 निरस्तीकरण, सुप्रीम कोर्ट 2023 फैसला । जम्मू कश्मीर विशेष दर्जा का अंत | धारा 370 पूरी जानकारी

Article 370 जम्मू–कश्मीर को भारत के भीतर एक विशेष संवैधानिक दर्जा देने वाली व्यवस्था थी, जिसे 5–6 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति के आदेश और संसद की मंज़ूरी से निरस्त कर दिया गया। 11 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने इस निरस्तीकरण को वैध ठहराते हुए साफ किया कि जम्मू–कश्मीर की कोई “आंतरिक संप्रभुता” नहीं थी और Article 370 एक अस्थायी प्रावधान था।​

शुरुआत: विलय और Article 370 की ज़रूरत

  • 1947 में महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान के हमले के बीच Instrument of Accession पर हस्ताक्षर कर जम्मू–कश्मीर को भारत से जोड़ा; भारत को रक्षा, विदेश और संचार पर अधिकार मिला, बाक़ी विषयों पर राज्य की स्वायत्तता बनी रही।​
  • इसी “अस्थायी समझौते” को संवैधानिक रूप देने के लिए 1949 में संविधान सभा ने Part XXI (Temporary, Transitional and Special Provisions) में Article 370 जोड़ा, ताकि युद्ध‑स्थिति और राजनीतिक संक्रमण के दौरान जम्मू–कश्मीर को विशेष व्यवस्था मिल सके।​

Jawaharlal Nehru और कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला की सहमति से यह तय हुआ कि आगे चलकर कश्मीर की राज्यीय संविधान सभा फैसला करेगी कि भारत के संविधान के कौन‑कौन से प्रावधान उस पर लागू होंगे और Article 370 को स्थायी रखना है या नहीं।​

Article 370 के मुख्य प्रावधान

Article 370 के तहत जम्मू–कश्मीर को छह प्रमुख विशेषताएँ मिलीं।​

  • भारत का संविधान वहाँ पूरी तरह स्वतः लागू नहीं था; राज्य को अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार मिला।​
  • शुरू में केंद्र को सिर्फ रक्षा, विदेश, संचार (बाद में वित्त भी) पर विधायी अधिकार था; अन्य विषयों पर क़ानून तभी बन सकता था जब राज्य सरकार “अनुमति” या “सम्मति (concurrence)” दे।​
  • संसद के नए क़ानूनों को जम्मू–कश्मीर पर लागू करने के लिए बार‑बार राष्ट्रपति आदेश (Constitution Application Orders) जारी किए गए; 1950 से 2019 तक 40 से ज़्यादा ऐसे आदेश हुए, जिनसे धीरे‑धीरे भारत का अधिकांश संविधान वहाँ लागू हो गया।​
  • राज्य के “स्थायी निवासियों” को संपत्ति, रोज़गार, छात्रवृत्ति आदि में विशेष अधिकार देने के लिए अलग प्रावधान किए गए; इन्हीं को बाद में अलग Article 35A के ज़रिए संवैधानिक सुरक्षा मिली।​

यानी दिखने में “विशेष स्वायत्तता” थी, लेकिन व्यावहारिक रूप से समय के साथ केंद्र–राज्य एकीकरण बढ़ता चला गया।​

1950–2019: विशेष दर्जे से धीरे‑धीरे एकीकरण तक

राज्यीय संविधान सभा और उसका विघटन

  • जम्मू–कश्मीर की संविधान सभा 1951 में बनी; इसने 1957 तक काम करते हुए राज्य का अलग संविधान तैयार किया और महाराजा की जगह “सदर‑ए‑रियासत” तथा बाद में मुख्यमंत्री–राज्यपाल व्यवस्था लागू की।​
  • 26 जनवरी 1957 को यह सभा भंग हो गई, लेकिन Article 370(3) में लिखा रहा कि इसे हटाने या बदलने के लिए उसी “Constituent Assembly of the State” की सिफारिश चाहिए।​

इसी बिंदु पर आगे चलकर यह बड़ा संवैधानिक प्रश्न बना कि जब संविधान सभा ही नहीं रही तो Article 370 को हटाया कैसे जा सकता है।​

राष्ट्रपति आदेशों के माध्यम से एकीकरण

1950–2019 के बीच केंद्र ने अनेक राष्ट्रपति आदेशों से जम्मू–कश्मीर पर:

  • सुप्रीम कोर्ट का अधिकार, CAG, Election Commission, UPSC, Emergency provisions, Fundamental Rights आदि लागू किए।​
  • राज्य के अलग “प्रधानमंत्री” और “सदर‑ए‑रियासत” के पद को क्रमशः मुख्यमंत्री और राज्यपाल में बदला।​

इसलिए कई विद्वानों ने इसे “asymmetric federalism” कहा – यानी भारत का हिस्सा होते हुए भी कुछ अतिरिक्त स्वायत्तता, पर सम्पूर्ण संप्रभुता नहीं।​

राजनीतिक बहस: समर्थक vs विरोधी

Article 370 के समर्थन में तर्क

  • कश्मीरी पहचान, संस्कृति और जनसांख्यिकीय संतुलन की सुरक्षा; बाहरी लोगों के ज़मीन खरीदने पर रोक से स्थानीय हितों की रक्षा।​
  • भारत‑कश्मीर संबंध “स्वैच्छिक” और “अनूठा” हैं, जिसे यह अनुच्छेद सम्मान देता है; इसे हटाने से अलगाववाद और अविश्वास बढ़ने का डर।​

विरोध में तर्क

  • समान नागरिकता की भावना के विपरीत “दो निशान, दो विधान” की स्थिति; पूरे भारत में एक समान संवैधानिक व्यवस्था की माँग।​
  • धारा 370 और 35A के कारण निवेश, उद्योग और नौकरियों में बाधा, तथा कुछ समूहों (जैसे पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थी, वाल्मीकि समुदाय, गोरखा आदि) के अधिकार सीमित।​

भारतीय राजनीति में खासकर जनसंघ और बाद में भाजपा ने शुरू से अपने घोषणा‑पत्र में Article 370 हटाने का वादा रखा।​

2019: धारा 370 का निरस्तीकरण – प्रक्रिया

5–6 अगस्त 2019 की घटनाएँ भारतीय संवैधानिक इतिहास की सबसे नाटकीय प्रक्रियाओं में से हैं।​

  1. राष्ट्रपति शासन और विधानसभा भंग
    2018 में जम्मू–कश्मीर में गठबंधन सरकार गिरने के बाद राज्यपाल शासन और फिर President’s Rule लगा; विधानसभा भंग हो चुकी थी, इसलिए “राज्य की सरकार” की जगह व्यावहारिक रूप से संसद और राष्ट्रपति ही कार्यपालिका बन गए।​
  2. Constitution (Application to J&K) Order, 2019 – C.O. 272 (5 अगस्त)
    • इस राष्ट्रपति आदेश से 1954 वाला पुराना आदेश निरस्त कर दिया गया और Article 367 (व्याख्या अनुच्छेद) में संशोधन कर दिया गया।​
    • कहा गया कि Article 370(3) में जहाँ भी “Constituent Assembly of the State” लिखा है, उसे “Legislative Assembly of the State” पढ़ा जाएगा।​
    • चूँकि उस समय राष्ट्रपति शासन था, इसलिए “Legislative Assembly” = भारतीय संसद, जिससे व्यावहारिक रूप से केंद्र सरकार खुद ही अनुशंसा देने की स्थिति में आ गई।​
  3. संसद में प्रस्ताव और J&K Reorganisation Act, 2019
    • 5 अगस्त को गृह मंत्री ने राज्यसभा में प्रस्ताव रखा कि Article 370 को निष्प्रभावी किया जाए और साथ ही Jammu and Kashmir Reorganisation Bill पेश किया, जिसमें राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों – जम्मू‑कश्मीर (with legislature) और लद्दाख (without legislature) – में बाँटने का प्रावधान था।​
    • 5 अगस्त को राज्यसभा और 6 अगस्त को लोकसभा ने प्रस्ताव और बिल मंज़ूर कर दिए।​
  4. C.O. 273 (6 अगस्त 2019)
    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दूसरा आदेश जारी किया, जिसके अनुसार Article 370 की सारी धाराएँ (सिवाय 1(1) के) निरस्त मानी गईं और पूरा भारतीय संविधान बिना किसी अपवाद के जम्मू–कश्मीर पर लागू हो गया।​

इस प्रकार संवैधानिक रूप से Article 370 “inoperative” कर दिया गया और जम्मू–कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म होकर वह दो UTs में विभाजित हो गया।​

निरस्तीकरण के तात्कालिक प्रभाव

  • राजनीतिक बदलाव: राज्यपाल की जगह लफ्टिनेंट गवर्नर, विधानसभा भंग; L.G. और केंद्र के अधीन अधिक नियंत्रण।​
  • कानूनी/संवैधानिक प्रभाव: J&K का अलग संविधान अप्रभावी; संपत्ति, नागरिकता, शिक्षा, नौकरी आदि पर विशेष अधिकार समाप्त; सभी भारतीय नागरिकों को वहाँ बसने, ज़मीन खरीदने, नौकरी पाने का समान अधिकार।​
  • सुरक्षा और संचार: कदम से पहले बड़े पैमाने पर अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, नेताओं की नज़रबंदी और लंबे समय तक इंटरनेट/मोबाइल बंद रहे, जिस पर अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर आलोचना हुई।​

सरकार का तर्क था कि इससे आतंकवाद, अलगाववाद और परिवारवादी राजनीति पर कड़ा प्रहार होगा, जबकि आलोचकों ने इसे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए ख़तरा बताया।​

सुप्रीम कोर्ट का फैसला (2023) और बाद की स्थिति

Article 370 हटाने को कई याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई; पाँच जजों की संविधान पीठ ने 11 दिसंबर 2023 को अपना फैसला सुनाया।​

कोर्ट ने क्या कहा?

  • Article 370 को “temporary provision” माना और कहा कि जम्मू–कश्मीर के पास कोई “आंतरिक संप्रभुता” नहीं थी; वह भारत का अभिन्न हिस्सा था।​
  • राष्ट्रपति को Article 370(3) के तहत इसे निरस्त करने का एकतरफ़ा अधिकार है; राज्य की सहमति आवश्यक नहीं, इसलिए C.O. 273 (abrogation order) वैध है।​
  • हालांकि, C.O. 272 के ज़रिए Article 370(3) में संशोधन करने को कोर्ट ने प्रक्रियात्मक रूप से अमान्य कहा, पर यह दोष अंतिम निरस्तीकरण आदेश को निरस्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।​
  • J&K को राज्य का दर्जा वापस देने की दिशा में केंद्र को “उचित समय” में कदम उठाने की उम्मीद जताई; लद्दाख UT के गठन को वैध माना।​

इस तरह न्यायपालिका ने बड़े पैमाने पर केंद्र के निर्णय को संवैधानिक हरी झंडी दे दी, भले ही राजनीतिक बहस आज भी जारी है।​

आज की स्थिति और परीक्षाओं के लिए मुख्य बिंदु

  • Article 370 और 35A दोनों निरस्त हो चुके हैं; जम्मू–कश्मीर और लद्दाख दो अलग‑अलग केंद्रशासित प्रदेश हैं।​
  • J&K में अब भारतीय संविधान और संसद के सभी क़ानून बिना किसी अपवाद के लागू हैं; स्थायी निवासी की पुरानी परिभाषा हट चुकी है, हालांकि केंद्र ने कुछ भूमि–सुरक्षा नियमों में सीमा‑बंदी रखी है।​
  • UPSC / State PSC / SSC के लिए याद रखने योग्य facts:
    • Article 370 – Part XXI, अस्थायी प्रावधान; J&K को विशेष दर्जा।​
    • Abrogation की तारीख – 5–6 अगस्त 2019, राष्ट्रपति आदेश C.O. 272 और C.O. 273, तथा J&K Reorganisation Act 2019।​
    • Supreme Court verdict – 11 दिसंबर 2023, पाँच‑जज पीठ, निरस्तीकरण को वैध, “temporary provision” और “no internal sovereignty” की घोषणा।​

इतिहास से लेकर वर्तमान तक Article 370 की पूरी यात्रा दरअसल भारत के संवैधानिक ढांचे, संघीय संबंधों, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय पहचान के बीच संतुलन खोजने की जटिल कथा है, जो आने वाले वर्षों में भी राजनीतिक और अकादमिक विमर्श का केंद्रीय विषय बनी रहेगी।

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