अरावली पर्वतमाला सिर्फ राजस्थान की भौतिक पहचान नहीं, बल्कि राज्य की जल–सुरक्षा, जलवायु संतुलन और जैविविधता की रीढ़ है। आज यही अरावली खनन, शहरीकरण और हाल के नीतिगत फैसलों के कारण गंभीर खतरे में पहुँच गई है, जिस पर विशेषज्ञ तक “राजस्थान के रेगिस्तान बनने” की चेतावनी दे रहे हैं।
अरावली: राजस्थान की जीवनरेखा
अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रेणियों में से एक मानी जाती है, जो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली है। यह राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थल और पूर्वी उपजाऊ भाग के बीच एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है, जो थार के रेतीले विस्तार को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है।
राजस्थान में अरावली जल स्रोतों (झीलें, तालाब, नदियाँ), जंगलों, वन्यजीवों और आदिवासी समुदायों की आजीविका का मुख्य आधार है, इसलिए इसे कई पर्यावरणविद “राजस्थान की लाइफलाइन” कहते हैं।
अरावली पर बढ़ता खनन और अवैध उत्खनन
पिछले कुछ दशकों में राजस्थान की अरावली में कानूनी–गैरकानूनी खनन ने सबसे ज्यादा विनाश किया है। पत्थर, ग्रेनाइट, मार्बल और खनिज की मांग बढ़ने के साथ हजारों खदानें पहाड़ियों को काट‑काट कर समतल कर चुकी हैं।
विभिन्न अध्ययनों और मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि अरावली की सैकड़ों पर्वत श्रृंखलाएँ नक्शों से गायब हो चुकी हैं, यानी पूरा–का–पूरा पहाड़ खोदकर मिटा दिया गया।
खनन से होने वाले प्रमुख नुकसान:
- पहाड़ियों का कटाव और जैवविविधता का तेज़ी से नाश।
- खनन क्षेत्रों से उठती धूल और आरपीएम (Respirable Particulate Matter) के कारण हवा का गंभीर प्रदूषण, जो NCR तक असर डालता है।
- खनन के कारण भूजल स्तर में गिरावट, सोते–झरने सूखना और नालों का रेत से भर जाना।
शहरीकरण, रियल एस्टेट और पर्यटन का दबाव
अरावली की एक और बड़ी दुश्मन अनियंत्रित शहरीकरण और रियल एस्टेट है। जयपुर, अलवर, उदयपुर, गुरुग्राम, दिल्ली–NCR जैसे क्षेत्रों में:
- पहाड़ियों को काटकर फार्महाउस, रिसॉर्ट, हाउसिंग कॉलोनी और हाईवे बनाए जा रहे हैं।
- जंगलों की जगह प्लॉटिंग, होटल और “हिल व्यू प्रोजेक्ट” खड़े हो रहे हैं।
विशेषज्ञ कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि
- एनसीआर क्षेत्र में रियल एस्टेट लॉबी,
- राजस्थान में खनन लॉबी,
- और उदयपुर–अबू–गुजरात बेल्ट में पर्यटन लॉबी
मिलकर अरावली के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा जमाए हुए हैं।
इस शहरीकरण का सीधा असर:
- वन्यजीव आवास (habitat) के टुकड़े‑टुकड़े होना,
- जानवरों के पारंपरिक कॉरिडोर टूटना,
- और मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ना (जैसे तेंदुए, लकड़बग्घा, सियार आदि)।
सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश और 100 मीटर विवाद
ताज़ा विवाद की जड़ एक नई कानूनी परिभाषा है, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय की उस परिभाषा को मान लिया गया जिसमें “अरावली” सिर्फ वही पहाड़ियाँ मानी जाएँगी जिनकी ऊँचाई 100 मीटर से अधिक है।
राजस्थान और एनसीआर के बड़े हिस्से में अरावली की पहाड़ियाँ 30–80 मीटर ऊँचाई के बीच हैं। यानी:
- लगभग 90% अरावली अब “कानूनी परिभाषा” से बाहर हो जाती है।
- जो हिस्सा 100 मीटर से कम है, उसे पहाड़ या अरावली मानकर संरक्षण नहीं दिया जाएगा।
विशेषज्ञों की बड़ी आपत्तियाँ:
- यह शर्त खनन और रियल एस्टेट लॉबी के लिए “ग्रीन सिग्नल” जैसी है, क्योंकि निचली पहाड़ियाँ सीधे–सीधे खनन के लिए खुल जाएँगी।
- पहले से ही खनन माफिया कई जगह 100 मीटर से ज़रा ऊँचे पहाड़ों को काटकर उन्हें 100 मीटर से नीचे ला रहे हैं, ताकि आगे उन्हें “अरावली” न माना जाए और पूरी तरह समतल किया जा सके।
- कई पर्यावरणविद इस आदेश को “अरावली के लिए डेथ वारंट पर हस्ताक्षर” जैसा बता रहे हैं।
हालाँकि कोर्ट ने कहा है कि वैज्ञानिक मैपिंग से पहले नई खनन लीज नहीं दी जाएगी, पर असली चिंता यह है कि निचली अरावली का क्या होगा, जो सबसे ज्यादा दबाव में है।
नीति और राजनीति की भूमिका
राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जल–पर्यावरण विशेषज्ञों ने राज्य सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं।
मुख्य बिंदु जो अक्सर उठाए जा रहे हैं:
- यदि वर्तमान नीति और 100 मीटर वाली परिभाषा लागू रही, तो आने वाले 15–20 साल में अरावली की हजारों पहाड़ियाँ संकट या विनाश की कगार पर पहुँच जाएँगी।
- यह सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि जल–संकट, खेती, ग्रामीण आजीविका और जनजातीय संस्कृति पर सीधा हमला है।
- कई वक्ताओं ने “Forest Conservation Act” की तर्ज पर “Mount Conservation Act” जैसी अलग कानूनी ढाल बनाने की माँग की है, ताकि पहाड़ियों को केवल ऊँचाई की शर्त पर न आँका जाए।
पर्यावरणीय दुष्परिणाम: रेगिस्तानीकरण का खतरा
अरावली सिर्फ पत्थरों की रेंज नहीं, बल्कि:
- पश्चिम से चलने वाली रेतीली हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक बाधा,
- मानसून बादलों को पकड़कर बारिश कराने वाली ऊँचाई,
- और भूजल रिचार्ज ज़ोन है।
यदि अरावली लगातार कटती रही तो:
- थार मरुस्थल की रेत और गरम हवाएँ पूर्व की ओर और गहराई तक बढ़ेंगी।
- राजस्थान के मध्य और पूर्वी जिलों में वर्षा और हरियाली और घट सकती है।
- राज्य “अधिक रेगिस्तानी और शुष्क” जलवायु की ओर बढ़ेगा, जैसा कि कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं।
जैवविविधता पर प्रभाव:
- तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, सुनहरा सियार, नीलगाय, हिरण और अनगिनत पक्षी–रेप्टाइल प्रजातियाँ अपने घर खो देंगी।
- सरिस्का जैसे टाइगर रिज़र्व और अन्य वन्यजीव अभयारण्यों पर खनन–धूल और जल–संकट का सीधा असर पड़ेगा।
स्थानीय समुदाय और आदिवासी आबादी पर असर
अरावली से सटे इलाकों में रहने वाले:
- भील, गरासिया जैसे आदिवासी समुदाय,
- चरवाहे और छोटे किसान
अपनी आजीविका के लिए जंगलों, घास के मैदानों, झरनों और चारागाहों पर निर्भर हैं।
जब पहाड़ काटे जाते हैं और जंगल हटते हैं:
- ईंधन, चारा और लघु वनोपज के स्रोत खत्म होते हैं।
- मिट्टी बंजर और पथरीली होती जाती है, जिस पर खेती मुश्किल होती है।
- अंततः लोग पलायन के लिए मजबूर होते हैं, शहरों के आसपास असंगठित मज़दूर बनकर रहने लगते हैं।
कई सामाजिक कार्यकर्ता चेतावनी दे रहे हैं कि अरावली को न बचाने का मतलब है आने वाली पीढ़ियों से पानी, स्वच्छ हवा और आजीविका छीन लेना।
समाधान: अरावली को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?
- कानूनी सुरक्षा मजबूत करना
- 100 मीटर जैसी तकनीकी शर्तों के बजाय पूरे अरावली क्षेत्र को “महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी क्षेत्र” (Ecologically Sensitive Area) घोषित करने की माँग।
- खनन पर सख्त और स्थायी प्रतिबंध वाले जोन, खासकर सरिस्का, माउंट आबू, उदयपुर–कोंट–आदिवासी बेल्ट और एनसीआर–बफर क्षेत्र।
- खनन और रियल एस्टेट पर नियंत्रण
- नई और पुरानी खनन लीज की पूरी पारदर्शी समीक्षा, अवैध खदानों पर तत्काल कार्यवाही।
- अरावली से निकले कच्चे पत्थरों का सरकारी प्रोजेक्ट्स में उपयोग बंद करने जैसे कदम, ताकि मांग घटे।
- रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लिए कड़े पर्यावरणीय क्लियरेंस और सख्त निगरानी।
- अरावली ग्रीन वॉल और पुनर्स्थापन (रिस्टोरेशन)
- बड़े पैमाने पर वनीकरण, स्थानीय प्रजातियों के पेड़ और घास लगाकर “ग्रीन वॉल” बनाना, ताकि कटे हुए हिस्से दोबारा हरे हो सकें।
- नालों–झीलों–जोहरों की पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित कर भूजल रिचार्ज बढ़ाना।
- स्थानीय समुदाय की भागीदारी
- ग्राम सभाओं, वन समितियों और आदिवासी संगठनों को संरक्षण योजनाओं में साझेदार बनाना।
- ईको–टूरिज्म, गैर–काष्ठ वन उत्पाद, जैविक खेती जैसी वैकल्पिक आजीविका को बढ़ावा देकर खनन पर निर्भरता घटाना।
- जागरूकता और जन आंदोलन
- स्कूल–कॉलेजों, प्रतियोगी परीक्षा तैयारी प्लेटफॉर्म और मीडिया के माध्यम से “Save Aravalli” जैसे अभियान।
- स्थानीय स्तर पर रैलियाँ, हस्ताक्षर अभियान और जन–सुनवाई, ताकि नीति–निर्माताओं पर दबाव बने।
