🕉️ राजस्थान में धर्म, संत एवं संप्रदाय
धर्म का अर्थ • बौद्ध धर्म • भक्ति आंदोलन • सगुण-निर्गुण • प्रमुख संत एवं पीठें
📜 धर्म का अर्थ एवं स्वरूप
1. कर्म आधारित धर्म – वर्ण धर्म (वर्ण के अनुसार कर्म) एवं आपद धर्म (आपातकालीन परिस्थितियों में वैकल्पिक कर्म, जैसे– शिक्षक द्वारा दुकान खोलना)।
2. आध्यात्मिक/पारलौकिक धर्म – मोक्ष (84 लाख योनियों के चक्र से मुक्ति) की प्राप्ति। मानव जीवन सबसे अंतिम जन्म है।
2. आध्यात्मिक/पारलौकिक धर्म – मोक्ष (84 लाख योनियों के चक्र से मुक्ति) की प्राप्ति। मानव जीवन सबसे अंतिम जन्म है।
📖 मोक्ष प्राप्ति के मार्गों का ऐतिहासिक विकास
सिंधु घाटी सभ्यताप्रकृति पूजक (पृथ्वी माता, पशुपति, जल पूजा, नाग पूजा)
वैदिक धर्मकर्मकाण्डीय – यज्ञों की प्रधानता, जटिल, खर्चीले, पशुबलि
उपनिषदिक धर्मज्ञान मार्गी – यज्ञों की आलोचना (मुण्डकोपनिषद् – “टूटी नौकाएँ”)
भगवद् गीतातीन मार्ग – ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग
- भक्ति परम्परा एवं अवतारवाद – ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। उदाहरण: अग्निकुण्ड सिद्धांत (वशिष्ठ ऋषि द्वारा प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चौहान)।
- ऐतिहासिक भक्ति का प्रसार – उद्भव: दक्षिण भारत (आलवार व नयनार) → उत्तर भारत: रामानंद → जन-जन: कबीर
☸️ राजस्थान और बौद्ध धर्म
महात्मा बुद्ध – बचपन: सिद्धार्थ, वंश: शाक्य क्षत्रिय, माता: महामाया, पिता: शुद्धोधन, पत्नी: यशोधरा (गोपा, बिंबा, भद्रा), पुत्र: राहुल
चार दृश्य – वृद्ध, रोगी, शव, सन्यासी → वैराग्य
महाभिनिष्क्रमण – 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग
सम्बोधि – 35 वर्ष की आयु में बोधगया में ज्ञान
मार विजय – बौद्ध धर्म की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना
धर्म चक्र प्रवर्तन – सारनाथ में 5 ब्राह्मणों को प्रथम उपदेश
चार दृश्य – वृद्ध, रोगी, शव, सन्यासी → वैराग्य
महाभिनिष्क्रमण – 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग
सम्बोधि – 35 वर्ष की आयु में बोधगया में ज्ञान
मार विजय – बौद्ध धर्म की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना
धर्म चक्र प्रवर्तन – सारनाथ में 5 ब्राह्मणों को प्रथम उपदेश
📌 बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत
- सर्वम् दुःखम् – संसार में सर्वत्र दुःख व्याप्त
- दुःख का कारण – तृष्णा/इच्छा (अज्ञान से उत्पन्न)
- अनात्मवाद – आत्मा जैसा कोई स्थायी तत्व नहीं
- पुनर्जन्म – आत्मा का नहीं, ऊर्जा का स्थानांतरण
📍 राजस्थान में बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र
- बैराठ – सबसे प्रमुख केंद्र, गोलाकार बौद्ध मंदिर, 8 विहार (ह्वेनसांग), भाब्रू शिलालेख
- झालावाड़ – कोलवी बिनायगा, हाथियागौड़ की बौद्ध गुफाएँ
- अन्य – भंडारेज (दौसा), आमेर (जयपुर)
बौद्ध मूर्तिकला शैलियाँ
| विशेषता | गांधार शैली | मथुरा शैली |
|---|---|---|
| सर्वप्रथम | सर्वाधिक मूर्तियाँ | बुद्ध की पहली मूर्ति |
| मूल स्वरूप | शारीरिक सौंदर्य | सौंदर्य + आध्यात्मिकता |
| पत्थर | काले ग्रेनाइट | लाल बलुआ पत्थर |
| प्रभाव | ग्रीक (यूनानी) | पूर्णतः स्वदेशी |
🕊️ राजस्थान में धर्म और भक्ति परम्परा
भक्ति आंदोलन का उद्भव – दक्षिण भारत (आलवार – वैष्णव, नयनार – शैव)
प्रसिद्ध उक्ति: “भक्ति द्राविड़ उपजी, लाये रामानंद, प्रकट किया कबीर ने, सप्त द्वीप नवखण्ड।”
प्रसिद्ध उक्ति: “भक्ति द्राविड़ उपजी, लाये रामानंद, प्रकट किया कबीर ने, सप्त द्वीप नवखण्ड।”
भक्ति के दो प्रमुख स्वरूप
| विशेषता | सगुण भक्ति | निर्गुण भक्ति |
|---|---|---|
| ईश्वर का स्वरूप | साकार | निराकार |
| साधन | मूर्ति पूजा, भजन, संगीत | ध्यान, साधना |
| पूजा स्थल | मंदिर (मूर्ति) | पीठ/मंदिर (गुरु की समाधि) |
| प्रमुख संत | रामानुज, रामानंद, वल्लभाचार्य, मीराबाई | कबीर, दादू, जसनाथ, जांभोजी |
🔱 शैव धर्म तथा नयनार भक्ति
- नयनार संत – 63, दक्षिण भारत में शैव भक्ति
- शिव के रूप – एकलिंग जी, सदाशिव, भवानीपति, संध्येश्वर, अर्धनारीश्वर, पिनाकिन, नटराज, पशुपति
📌 शैव धर्म के प्रमुख संप्रदाय
- पाशुपत – प्रवर्तक: भगवान लकुलीश (कायावरोहण, गुजरात), राजस्थान में प्रसार: हरित ऋषि। बप्पा रावल ने कैलाशपुरी में एकलिंग जी मंदिर बनवाया।
- नाथ – आदि प्रवर्तक: शिव, प्रवर्तक: मच्छिन्द्रनाथ, सर्वाधिक प्रचार: गोरखनाथ। प्रमुख पीठें: मन्ननाथ पीठ (जोधपुर – मानसिंह राठौड़), बेराग पीठ (दादा दरा, पुष्कर)
- कापालिक, कालमुख, मातामयूर – तांत्रिक, ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित
🕉️ वैष्णव धर्म तथा आलवार भक्ति
- आलवार संत – 12, एकमात्र महिला: आंडाल
- दार्शनिक आधार – रामानुजाचार्य
A. संत रामानुजाचार्य
- जन्म: श्रीपेरम्बुदूर (तमिलनाडु), माता-पिता: कान्तिमति एवं केशव
- गुरु: यादव प्रकाश (बोधायन के वेदांत), यामुनाचार्य (मानस गुरु)
- विशिष्टाद्वैत दर्शन – श्री भाष्य (ब्रह्मसूत्र पर टीका)
- रचनाएँ: वेदांत सार, वेदांत संग्रह, भगवद्गीता पर टीका
- संप्रदाय: श्री वैष्णव (श्री सम्प्रदाय)
- दक्षिणावर्तन सिद्धांत – वर्ण व्यवस्था का विरोध (सामाजिक), स्वीकार (धार्मिक)
B. संत रामानंद
भूमिका: श्री सम्प्रदाय के देश गुरु, भक्ति को दक्षिण से उत्तर लाने वाले
जन्म: प्रयागराज, शिक्षा: वाराणसी
प्रमुख विशेषताएँ: क्षेत्रीय हिन्दी में उपदेश, वर्ण व्यवस्था का पूर्ण विरोध
उक्ति: “जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।”
आकाश धर्म गुरु – डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (शिष्य दोनों धाराओं में विभाजित)
12 प्रमुख शिष्य: कबीरदास, सेन पिपा, धन्ना, सेना, साधना, रैदास, सुरसुरी, पद्मावती, भावानंद, सुखानंद, अनन्तानंद, सुरसुरानंद
संप्रदाय: रामानंदी (वैरागी संघ)
जन्म: प्रयागराज, शिक्षा: वाराणसी
प्रमुख विशेषताएँ: क्षेत्रीय हिन्दी में उपदेश, वर्ण व्यवस्था का पूर्ण विरोध
उक्ति: “जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।”
आकाश धर्म गुरु – डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (शिष्य दोनों धाराओं में विभाजित)
12 प्रमुख शिष्य: कबीरदास, सेन पिपा, धन्ना, सेना, साधना, रैदास, सुरसुरी, पद्मावती, भावानंद, सुखानंद, अनन्तानंद, सुरसुरानंद
संप्रदाय: रामानंदी (वैरागी संघ)
📍 राजस्थान में रामानंदी संप्रदाय
- कृष्णदास पयहारी – अनन्तानंद के शिष्य, 16वीं शताब्दी में प्रसार, गलता जी (जयपुर) में पीठ स्थापना (उत्तर तोताद्रि / मंकी वैली), रचनाएँ: प्रेम तत्त्व, प्रेम रस रूप
- संत अग्रदास जी – कृष्णदास पयहारी के शिष्य, रैवासा धाम में पीठ, रसिक संप्रदाय (राम-सीता की श्रृंगारिक पूजा)
- संरक्षण: सवाई जयसिंह द्वितीय, कृष्णभट्ट को “राम रसाचार्य” की उपाधि
🕉️ मध्वाचार्य
- अवतार: वायु देवता का तीसरा अवतार (प्रथम–हनुमान, द्वितीय–भीम)
- अन्य नाम: पूर्ण प्रज्ञ, आनन्द तीर्थ
- दर्शन: द्वैतवाद (पूर्ण प्रज्ञ भाष्य – ब्रह्मसूत्र)
- संप्रदाय: ब्रह्म संप्रदाय (गौड़ीय संप्रदाय – चैतन्य महाप्रभु)
- विशेष: पशु बलि का विरोध
🕉️ चैतन्य महाप्रभु एवं गौड़ीय संप्रदाय
जन्म: नवद्वीप/नदिया (बंगाल), मूल नाम: विश्वम्भर, निमाई
उपाधि: भगवान कृष्ण का शापित अवतार
गुरु: गंगादास पंडित, केशव भारती, ईश्वरपुरी
दर्शन: अचिन्त्य भेदाभेद (सगुण और निर्गुण दोनों सत्य)
कीर्तन प्रथा – नृत्य एवं संगीत युक्त भक्ति
संप्रदाय: गौड़ीय वैष्णव (नव्य गौड़ीय)
प्रमुख साहित्य: शिक्षाष्टक (स्वयं), चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज), चैतन्य भागवत (वृन्दावन दास), चैतन्य मंगल (जयनन्द व लोचन दास)
उपाधि: भगवान कृष्ण का शापित अवतार
गुरु: गंगादास पंडित, केशव भारती, ईश्वरपुरी
दर्शन: अचिन्त्य भेदाभेद (सगुण और निर्गुण दोनों सत्य)
कीर्तन प्रथा – नृत्य एवं संगीत युक्त भक्ति
संप्रदाय: गौड़ीय वैष्णव (नव्य गौड़ीय)
प्रमुख साहित्य: शिक्षाष्टक (स्वयं), चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज), चैतन्य भागवत (वृन्दावन दास), चैतन्य मंगल (जयनन्द व लोचन दास)
📍 राजस्थान में गौड़ीय संप्रदाय
- मानसिंह प्रथम – वृन्दावन में गोविन्द देव जी मंदिर
- सवाई जयसिंह द्वितीय – गोविन्द देव जी की प्रतिमा वृन्दावन से जयपुर लाए
राजस्थान में गौड़ीय संप्रदाय की 5 पीठें
| क्रम | पीठ/मंदिर | स्थान |
|---|---|---|
| 1 | गोविन्द देव जी (मुख्य) | जयपुर |
| 2 | गोपीनाथ जी | जयपुर |
| 3 | राधा वल्लभ जी | जयपुर |
| 4 | राधा विनोद जी | जयपुर |
| 5 | मदन मोहन जी | करौली (गौड़ीय) |
🕉️ आचार्य निम्बार्क एवं निम्बार्क संप्रदाय
- जन्म: तेलुगु ब्राह्मण, अन्य नाम: भास्कर, अवतार: सुदर्शन चक्र
- दर्शन: द्वैताद्वैतवाद / भेदाभेद
- ग्रंथ: वेदान्त पारिजात सौरभ, सिद्धान्त रत्न, दशश्लोकी
- उपासना: राधा-कृष्ण के युगल रूप
- राजस्थान में प्रसार: आचार्य परशुराम (खंडेला, सीकर) → सेलमाबाद (किशनगढ़) में पीठ, रचना: परशुराम सागर
🕉️ वल्लभाचार्य एवं पुष्टिमार्ग संप्रदाय
जन्म: चम्पारण, माता-पिता: लक्ष्मण भट्ट और इलम्मा, अवतार: अग्नि
गुरु: दामोदर दास, विष्णु स्वामी
दर्शन: शुद्धाद्वैत
उपाधि: वागीश (कृष्णदेव राय)
आराध्य देव: श्रीनाथ जी (बाल कृष्ण)
पुष्टिमार्ग: विट्ठलनाथ जी के समय लोकप्रिय (पुष्टि = ईश्वर की कृपा)
अष्टछाप: विट्ठलनाथ जी द्वारा स्थापित 8 कवि (सूरदास, कुंभनदास आदि)
शब्दावली: हवेली/द्वारा (मंदिर), हवेली संगीत (भजन), झांकी (दर्शन)
गुरु: दामोदर दास, विष्णु स्वामी
दर्शन: शुद्धाद्वैत
उपाधि: वागीश (कृष्णदेव राय)
आराध्य देव: श्रीनाथ जी (बाल कृष्ण)
पुष्टिमार्ग: विट्ठलनाथ जी के समय लोकप्रिय (पुष्टि = ईश्वर की कृपा)
अष्टछाप: विट्ठलनाथ जी द्वारा स्थापित 8 कवि (सूरदास, कुंभनदास आदि)
शब्दावली: हवेली/द्वारा (मंदिर), हवेली संगीत (भजन), झांकी (दर्शन)
वल्लभ संप्रदाय की 7 पीठें
| क्रम | पीठ | स्थान |
|---|---|---|
| 1 | विट्ठलनाथ जी (श्रीनाथ जी) – सबसे प्रमुख | नाथद्वारा (राजसमंद) |
| 2 | द्वारिकाधीश जी | कांकरोली (राजसमंद) |
| 3 | मथुरेश जी | कोटा |
| 4 | गोकुल चन्द्र जी | कामां (भरतपुर) |
| 5 | मदन मोहन जी | कामां (भरतपुर) |
| 6 | गोकुलनाथ जी | गोकुल (उ.प्र.) |
| 7 | बालकृष्ण जी | सूरत (गुजरात) |
- विशेष: किशनगढ़ के सावंत सिंह ने राजपाट त्यागकर नागरीदास नाम रखा
🕊️ सगुण भक्ति: मीराबाई
- जन्म: कुड़की (पाली), बचपन का नाम: पेमल
- पिता: रतन सिंह (राव दूदा के पुत्र), पति: भोजराज (राणा सांगा के पुत्र)
- गुरु: रैदास (छतरी – कुंभश्याम मंदिर, चित्तौड़), जीव गोस्वामी
- उपाधि: राजस्थान की राधा
- निधन: द्वारिका (गुजरात) में रणछोड़ जी की प्रतिमा में विलीन
🕊️ निर्गुणपंथी संत एवं संप्रदाय
संत दादू दयाल जी एवं दादू संप्रदाय
जन्म: अहमदाबाद (गुजरात), पालित पुत्र: लोदीराम (ब्राह्मण)
गुरु: कबीर दास, संत बुद्धानंद
कर्मभूमि: दौसा (भाषा: सधुक्कड़ी)
जीवन यात्रा: करडाला (नागौर – 6 वर्ष तप) → साँभर (1568 – धुनिया) → आमेर (1573 – 14 वर्ष) → फतेहपुर सीकरी (1585-86 – अकबर से मुलाकात) → नारायणा/नैराना (1602 – 1603 में निर्वाण)
शिष्य: कुल 152 (52 प्रमुख – 52 स्तंभ, 100 वीतरागी)
प्रमुख शिष्य: गरीबदास (पुत्र), मसकीनदास (पुत्र), जगजीवन, बखाना, रज्जब, सुंदरदास
गुरु: कबीर दास, संत बुद्धानंद
कर्मभूमि: दौसा (भाषा: सधुक्कड़ी)
जीवन यात्रा: करडाला (नागौर – 6 वर्ष तप) → साँभर (1568 – धुनिया) → आमेर (1573 – 14 वर्ष) → फतेहपुर सीकरी (1585-86 – अकबर से मुलाकात) → नारायणा/नैराना (1602 – 1603 में निर्वाण)
शिष्य: कुल 152 (52 प्रमुख – 52 स्तंभ, 100 वीतरागी)
प्रमुख शिष्य: गरीबदास (पुत्र), मसकीनदास (पुत्र), जगजीवन, बखाना, रज्जब, सुंदरदास
📌 दादू पंथ का विभाजन (1750 ई.) – 5 शाखाएँ
- खालसा – गरीबदास जी की शिष्य परंपरा, नारायणा मुख्य पीठ
- विरक्त – गाँव-गाँव प्रचार, मुख्य पीठ: जयपुर (राजगढ़/दयाल बाग)
- उत्तरादे – बनवारीदास जी, मुख्य पीठ: रीवा (हरियाणा)
- खाकी – शरीर पर राख, छोटी कुटियाँ
- नागा – सुंदरदास जी, योद्धा, सेना में स्थान
- मेला: फाल्गुन शुक्ल पंचमी से एकादशी, नारायणा
- दादू खोल गुफा: भैराणा पहाड़ी (नारायणा) – फागुन पूर्णिमा पर खुलती है
संत जसनाथ जी एवं जसनाथी संप्रदाय
- मूल नाम: जसभंत, जन्म: 1482, कतरियासर (बीकानेर), माता-पिता: रूपा-हमीर
- गुरु: गोरखनाथ (नाम बदलकर जसनाथ)
- उपासना: निर्गुण निराकार, मूर्ति पूजा विरोध
- नियम: 36, पहचान: भगवा वस्त्र, काले ऊन का धागा
- अग्नि नृत्य: धूणा/धूणा पर फक्कड़-फक्कड़ नृत्य
- ग्रंथ: उपदेश सिंभूदड़ा, कोंडा
- शिष्य: जग्गा, हरिकरण, लालगिरी (जीव संवादलीला), रामनाथ (अनुभव पुराण)
विश्नोई संप्रदाय
जन्म: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, पीपासर (नागौर), माता-पिता: हंसा देवी-लोहट
आराध्य: विष्णु (निर्गुण-निराकार)
29 नियम – विश्नोई (बीस+नौ)
मुख्य उपदेश: हरे वृक्षों को न काटें, जीवों पर दया, नशीले पदार्थ निषेध
ग्रंथ: जंभवाणी, जम्भ संहिता, विश्नोई धर्म प्रकाश, जम्भ सागर
तीर्थ स्थल: पीपासर (जन्म), समराथल (1485 – स्थापना), मुकाम तालवा (निर्वाण – मुख्य पीठ), रोटू, रामड़ावास, जांगलू
आराध्य: विष्णु (निर्गुण-निराकार)
29 नियम – विश्नोई (बीस+नौ)
मुख्य उपदेश: हरे वृक्षों को न काटें, जीवों पर दया, नशीले पदार्थ निषेध
ग्रंथ: जंभवाणी, जम्भ संहिता, विश्नोई धर्म प्रकाश, जम्भ सागर
तीर्थ स्थल: पीपासर (जन्म), समराथल (1485 – स्थापना), मुकाम तालवा (निर्वाण – मुख्य पीठ), रोटू, रामड़ावास, जांगलू
संत लालदास जी एवं लालदासी संप्रदाय
- जन्म: धौलीदूबा (अलवर), माता-पिता: समदा-चाँदमल, जाति: वैश्य मेव मुस्लिम
- गुरु: गद्दन चिश्ती, क्षेत्र: अलवर–भरतपुर (मेवात)
- समाधि: शेरपुर (अलवर), सिद्धांत: निर्गुण, हिंदू-मुस्लिम एकता, मांगलिक विधियों का निषेध
संत चरणदास जी एवं चरणदासी संप्रदाय
मूल नाम: रंजीत, जन्म: डेहरा (अलवर), माता-पिता: कुंजी देवी-मुरलीधर
गुरु: सुखदेव, मुख्य पीठ: दिल्ली (चैत्र पंचमी मेला)
विशेषता: सगुण-निर्गुण समन्वय, कर्म प्रधान, नैतिक शुद्धता
शिष्य: 52 (सहजोबाई – सहज प्रकाश, दयाबाई – दयाबोध)
भविष्यवाणी: नादिर शाह के आक्रमण की
गुरु: सुखदेव, मुख्य पीठ: दिल्ली (चैत्र पंचमी मेला)
विशेषता: सगुण-निर्गुण समन्वय, कर्म प्रधान, नैतिक शुद्धता
शिष्य: 52 (सहजोबाई – सहज प्रकाश, दयाबाई – दयाबोध)
भविष्यवाणी: नादिर शाह के आक्रमण की
निरंजनी संप्रदाय
- प्रवर्तक: संत हरिदास जी (हरि सिंह सांखला), जन्म: कापड़ोद (डीडवाना, नागौर)
- पूर्वभूमि: डकैत → संत (राजस्थान का वाल्मीकि)
- उपासना: निरंजन (निराकार), समन्वय: सगुण-निर्गुण
- ग्रंथ: राज प्रकाश, हरि पुरुष जी री वाणी
- चिन्ह: गादा
अलखिया संप्रदाय
- प्रवर्तक: साधु लालगिरि, जन्म: सुलाखिया (बूंदी)
- ग्रंथ: महा रहस्य, कुंडलियाँ
- मुख्य पीठ: गलता (जयपुर)
संत मावजी एवं निष्कलंकी संप्रदाय
- प्रवर्तक: संत मावजी, मुख्य पीठ: साबला (डूँगरपुर)
- अवतार: कल्कि (विष्णु का 10वाँ अवतार)
- वाणी: चौपड़ा (वागड़ी भाषा, वाद-विवाद शैली, भविष्यवाणियाँ)
- लासोड़िया आंदोलन – अछूतों के उत्थान के लिए
- समाज सुधार: अंतरजातीय विवाह, विधवा विवाह
गूदड़ संप्रदाय
- प्रवर्तक: संतदास जी (गूदड़ी के वस्त्र), मुख्य पीठ: डांडता (श्रीगंगानगर)
परनामी संप्रदाय
- प्रवर्तक: प्राणनाथ जी, प्रधान गद्दी: पन्ना (म.प्र.), ग्रंथ: कुलजम स्वरूप
- राजस्थान में: जयपुर (आदर्श नगर) में मंदिर
🕊️ रामस्नेही संप्रदाय
मूल विचारधारा: राम नाम (निर्गुण ब्रह्म) का स्मरण, मूर्ति पूजा, तीर्थ, व्रत-उपवास, बहुदेववाद का विरोध
4 प्रमुख शाखाएँ:
4 प्रमुख शाखाएँ:
- रेण शाखा (नागौर) – प्रवर्तक: संत दरियाव जी (जैतारण, पाली), गुरु: प्रेमाचार्य। ‘र’ = राग, ‘म’ = मोहम्मद → हिंदू-मुस्लिम एकता। मेला: पूर्णिमा
- शाहपुरा शाखा (भीलवाड़ा) – प्रवर्तक: संत रामचरण जी (मूल नाम: रामकिशन, सोड़ा, टोंक), गुरु: कृपाराम। ग्रंथ: अनभै वाणी। मेला: चैत्र कृष्ण पंचमी – फूल डोल मेला
- सिंहथल शाखा (बीकानेर) – प्रवर्तक: हरिरामदास, गुरु: जैमलदास। ग्रंथ: निशानी। गुरु को अधिक महत्व, हिंदू-मुस्लिम दोनों आडंबरों का विरोध
- खेड़ापा शाखा (जोधपुर) – प्रवर्तक: रामदास (भीमकोरड़ी), गुरु: हरिरामदास। अनुयायी: सफेद वस्त्र, गृहस्थ जीवन आवश्यक
🕊️ संत पीपा
- मूल नाम: प्रताप सिंह खींची (खींची वंश)
- गुरु: रामानंद (12 शिष्यों में से एक)
- आराध्य: दर्जी समुदाय (दर्जी वृत्ति)
- स्थल: मंदिर – समदड़ी (बाड़मेर), छतरी – गागरोन (झालावाड़), गुफा – टोडा (टोंक)
- विशेष: वचन गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित, पीपा चरित में चमत्कार
🕊️ संत धन्ना जी
- जन्म: धुआँ (टोंक), गुरु: रामानंद
- विशेषता: गृहस्थ + कृषि, धर्म-आडंबर विरोधी, पत्थर की प्रतिमा में विश्वास नहीं
🕊️ संत सुंदरदास जी
- छोटे: जन्म: दौसा, माता-पिता: सती-परमानंद, गुरु: दादू दयाल। ग्रंथ: ज्ञान समुद्र, ज्ञान सवैया, सुंदर ग्रंथावली, सुंदर सारा। दादू के उपदेशों का प्रचार
- बड़े: दादू पंथ में नागा पंथ की शुरुआत
🕊️ संत रज्जब जी
- संबंध: सांगानेर (जयपुर), गुरु: दादू दयाल
- विशेषता: विवाह का त्याग, आजीवन दूल्हे के भेष में
- रचनाएँ: सर्वांगी, रज्जब वाणी
✍️ MCQ – राजस्थान में धर्म, संत एवं संप्रदाय
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